जयशंकर और डोभाल की रूस-चीन यात्रा के कूटनीतिक संदेश को ऐसे समझिए
मॉस्को में जयशंकर, बीजिंग में डोभाल: रूस और चीन के साथ एक साथ साधे जा रहे रणनीतिक हित
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नई दिल्ली। भारत की विदेश नीति इन दिनों एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संतुलन के दौर से गुजर रही है। एक ओर रूस के साथ दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को बदलती वैश्विक परिस्थितियों में नई मजबूती देने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी ओर चीन के साथ सीमा तनाव को नियंत्रित करने और संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर जोर है।
इसी क्रम में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मॉस्को यात्रा और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा को महज दो अलग-अलग कूटनीतिक यात्राओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इन दोनों यात्राओं के पीछे भारत की व्यापक रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखीय विदेश नीति की तस्वीर दिखाई देती है।
भारत न तो रूस के साथ अपने संबंधों को पश्चिमी दबाव के कारण सीमित करना चाहता है और न ही चीन के साथ प्रतिस्पर्धा को अनियंत्रित टकराव में बदलने देना चाहता है।
रूस में जयशंकर: पुराने संबंधों को नई दिशा
जयशंकर की मॉस्को यात्रा का महत्व केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है। भारत और रूस के बीच ऊर्जा, व्यापार, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान एवं तकनीक और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाना भी महत्वपूर्ण एजेंडा है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखा है। नई दिल्ली का प्रयास रूस को केवल रक्षा उपकरणों के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा, तकनीक, परमाणु सहयोग और दीर्घकालीन आर्थिक साझेदारी के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने का है।
चीन में डोभाल: सीमा सुरक्षा पर फोकस
अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा का प्रमुख फोकस भारत-चीन सीमा विवाद और LAC पर स्थिरता रहा।
गलवान संकट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सबसे बड़ी चुनौती यही रही है कि सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य स्थिति में कैसे लाया जाए।
भारत का रुख स्पष्ट है—सीमा पर शांति और स्थिरता अच्छे भारत-चीन संबंधों की बुनियादी शर्त है।
इसलिए डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत का असली परीक्षण इस बात से होगा कि LAC पर सैन्य तनाव कम करने और विश्वास बहाली की दिशा में कितनी ठोस प्रगति होती है।
मोदी-शी मुलाकात और BRICS पर नजर
पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा हो सकती है।
सितंबर में प्रस्तावित BRICS शिखर सम्मेलन के संदर्भ में भारत-चीन संवाद को विशेष महत्व मिल जाता है। यदि शी जिनपिंग भारत आते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात होती है, तो यह दोनों देशों के संबंधों में आगे की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हो सकता है।
ऐसे में डोभाल की बीजिंग यात्रा को केवल सीमा वार्ता मानना अधूरा होगा।
संभावित रणनीतिक क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है—
LAC पर तनाव नियंत्रित हो → सैन्य जोखिम घटे → राजनीतिक संवाद बढ़े → मोदी-शी मुलाकात का माहौल बने → BRICS में भारत अपनी प्राथमिकताएं आगे बढ़ाए।
संवाद का अर्थ चीन के सामने झुकना नहीं
भारत और चीन के बीच संवाद बढ़ने को कमजोरी के रूप में देखना सही नहीं होगा।
संवाद का अर्थ समझौता नहीं है।
तनाव कम करना सीमा विवाद छोड़ना नहीं है।
व्यापार बढ़ाना रणनीतिक भरोसा पूरी तरह बहाल होना नहीं है।
भारत चीन के साथ संवाद इसलिए चाहता है क्योंकि दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी हैं। लंबे समय तक सीमा पर तनाव दोनों देशों के आर्थिक और सैन्य हितों के लिए नुकसानदेह है।
इसलिए डोभाल की बीजिंग यात्रा को Managed Competition यानी नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।
भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति
जयशंकर और डोभाल की यात्राओं को एक साथ देखने पर भारत की विदेश नीति का व्यापक ढांचा सामने आता है।
मॉस्को — रणनीतिक, ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा
बीजिंग — सीमा सुरक्षा और तनाव प्रबंधन
नई दिल्ली — BRICS और वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व
अमेरिका, यूरोप और जापान — तकनीक, निवेश, रक्षा और Indo-Pacific सहयोग
भारत का विकल्प “रूस या अमेरिका” अथवा “चीन या अमेरिका” नहीं है।
भारत की रणनीति है—जहां भारतीय राष्ट्रीय हित जिस साझेदारी की मांग करें, वहां उस साझेदारी को आगे बढ़ाना।
यही रणनीतिक स्वायत्तता का व्यावहारिक रूप है।
रूस-चीन समीकरण के बीच भारत की चुनौती
भारत के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती यह है कि रूस और चीन की बढ़ती नजदीकी के बीच मॉस्को के साथ अपने विशेष संबंधों को कैसे मजबूत रखा जाए और बीजिंग के साथ सीमा तनाव को कैसे नियंत्रित किया जाए।
रूस से अत्यधिक दूरी भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पैदा कर सकती है, जबकि चीन के साथ लगातार बढ़ता तनाव दो मोर्चों पर दबाव बढ़ा सकता है।
इसलिए भारतीय रणनीति का मूल संदेश साफ दिखाई देता है—
रूस को दूर मत जाने दो।
चीन को अनियंत्रित मत होने दो।
अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर मत हो।
और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखो।
आगे की राह में चार बड़ी परीक्षाएं
आने वाले महीनों में भारत की कूटनीति के सामने चार बड़े सवाल होंगे—
पहला—LAC: क्या भारत और चीन सीमा पर स्थायी सैन्य स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ेंगे?
दूसरा—रूस: क्या भारत-रूस सहयोग रक्षा से आगे बढ़कर ऊर्जा, तकनीक, निवेश और व्यापार तक पहुंचेगा?
तीसरा—BRICS: क्या भारत इस मंच का इस्तेमाल वैश्विक दक्षिण और अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर पाएगा?
चौथा—अमेरिका: क्या Washington भारत की रूस नीति और चीन के साथ संवाद को स्वीकार करते हुए Indo-Pacific में भारत को प्रमुख साझेदार बनाए रखेगा?
निष्कर्ष
जयशंकर का मॉस्को और डोभाल का बीजिंग दौरा वास्तव में दो अलग-अलग यात्राएं होते हुए भी एक ही भारतीय रणनीति के दो पहलू हैं।
जयशंकर रणनीतिक गहराई और आर्थिक-ऊर्जा साझेदारी को संभाल रहे हैं, जबकि डोभाल सीमा सुरक्षा और चीन के साथ तनाव प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
भारत रूस और चीन में से किसी एक को चुनने के बजाय दोनों के साथ अपने संबंधों को इस तरह संतुलित करना चाहता है कि उसकी सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा एक साथ मजबूत रहे।
यही भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति की सबसे बड़ी विशेषता है।
कूटनीतिक संतुलन भारत के लिए विकल्प नहीं, बल्कि अपरिहार्यता है।
— कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।
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